पांडे़ कौन कुमति तोहें लागी

पांडे़ कौन कुमति तोहें लागी

पांडे़ कौन कुमति तोहें लागी

काशीनाथ सिंह

 

कहना तन्नी गुरु का कि अस्सी-भदैनी का ऐसा कोई घर नहीं जिसमें पंडे, पुरोहित और पंचांग न हों और ऐसी कोई गली नहीं जिसमें कूड़ा, कुत्ते और किराएदार न हों.

तन्नी गुरु में एक ऐब है. ऐब यह है कि वे कहते हैं और भूल जाते हैं और यह भी कि कहना कुछ चाहते हैं, कह कुछ और जाते हैं. बुढ़ापे में ऐसा होता होगा शायद! जैसे-वे कहना चाहते थे कि ‘कोई-कोई’ घर और ‘कोई-कोई’ गली लेकिन ऐसे बोल गए जैसे ‘सब’.

तो ‘पंचांग’ और ‘किराएदार’-ये जीविका के सहारा थे पंडों के. पंचांग तो कोई बात नहीं, लेकिन समय बदलने के साथ किराएदार हरामी होने लगे! समझिए कि मारे-मारे फिर रहे हैं गली-गली, भगाए जा रहे हैं दरवज्जे-दरवज्जे से कि चलो, फूटो हियां से-लखैरों के लिए कोई कोठरी नहीं!

ऐसे में जगह दो दया करके, किराया बस इतना कि समझो मुफ्त में लेकिन महीने के अंत में हर बार किच-किच. बिजली का बिल हो तो किच-किच, पानी न मिले तो किच-किच, कहो-खाली करो तो किच-किच! इस तरह एक तो सारी जिंदगी किचाइन करो और जरा-सी भी आंखें भजीं नहीं कि कोठरी गई हाथ से, उनके नाम अलाॅट. फिर लड़ते रहिए सारी जिंदगी मुकदमा. और अगर किराएदार कहीं पड़ोसी जनपद चंदौली, गाजीपुर, बलिया, जौनपुर या बिहार के हुए तो कोठरी क्या, मकान ही गया. कहां से जुटाएंगे आप उतना लाठी-डंडा, बल्लम-गंड़ासा, तमंचा-बंदूक?

ऐसे में बाबा विश्वनाथ से अपने भक्तों का यह दुख देखा नहीं गया.

उन्होंने विदेशियों को भेजना शुरू किया-बड़े पैमाने पर. संगीत-समारोहों और घाटों के दर्शन के लिए. ये सारे समारोह अस्सी-भदैनी के आसपास होते हैं-जनवरी से अप्रैल के बीच. शहर में होटल भी थे लेकिन महंगे और दूर. धीरे-धीरे केदार घाट से लेकर नगबा के बीच के सारे घाटों के मकान लाॅज बनने लगे. लेकिन वे ज्यादातर लाॅज थे, होटल नहीं. आप वहां ठहर तो लेंगे, खाएंगे-पिएंगे कहां? उनकी इस जरूरत को समझा छोटी और निचली जातियों ने. बाभन तो उन्हें अपने घर में जगह देने से रहे लेकिन निचली जातियों ने नगर में एक नई संस्कृति चालू की-‘पेइंग गेस्ट’ की. वह भी महीने के नहीं, डेली के हिसाब से.

यह सिलसिला शुरू हुआ था-85 के आसपास.

मुहल्ले के बाभन-ठाकुर उन्हें गरियाते रहे, धिक्कारते रहे, सरापते रहे-लेकिन उनकी हैसियत में फर्क आते देखकर पछताते भी रहे.

कौन बाभन साहस करे अंगरेज-अंगरेजिन को अपने मकान में रखने की? कोई भी तो एक घर नहीं जिसमें मंदिर न हो. अगर रखा तो किसी को जीने नहीं देंगे पांडेय धर्मनाथ शास्त्राी!

यह कहानी इन्हीं शास्त्राी जी की है.

और यह कहानी तब की है जब उड़ीसा में ग्राहम स्टेंस-हत्याकांड हो चुका था और विदेशियों के चेहरे पर दहशत की हल्की छाया थी और मकान मालिकों के माथे पर चिंताएं-ऐसा न हो कि ये किराए पर उठी कोठरियां छोड़कर खिसक लें और आगे से आना ही बंद कर दें!

 

अस्सी की गलियां! अहा, क्या कहिए!

चलिए या हाथ मलिए या सिर धुनिए.

चैराहे से बाएं, फिर दाएं, फिर बाएं, फिर सीधे, फिर जरा-सा यूं दाएं, फिर सीधे. पहुंच गए अब घाट पर. वहीं पांडेय धर्मनाथ शास्त्री का मकान है.

अस्सी की हर गली गंगा की ओर खुलने वाली खिड़की और घाट के हर मकान की खिड़की पर्यटकों की आंख की पुतली.

गोबर, मूत, टट्टी, सांड़, खुले सीवर, पनाले, कूड़ा-कचरा और बाएं-दाएं की दीवारों को दरेरते जब कन्नी गुरु शास्त्राी जी के मकान पर पहुंचे तो अंगरेजिन को बड़ा-सा बोर्ड दिखाया-‘यू सी, ए ग्रेट पंडित! व्याकरणाचार्या, जोतिषाचार्या, भिषगाचार्या, वेदाचार्या! यू सी मेनी आचार्याज! व्हाट अंडरस्टैंड? पामिस्ट आलसो! हिंदी इन ट्‌वेंटी सेवेन डेज. संस्कृत इन सिक्स मंथ’.

अंगरेजिन ‘हूं’ करते हुए कभी बोर्ड को देखती, कभी कन्नी गुरु को!

फटी आंखों ‘हुम’ करते हुए वह देर तक सिर हिलाती रही.

अलकतरे से पुते हुए काले किवाड़ दुपलिया. कोई काॅलबेल नहीं. कन्नी ने सिंकड़ी खटखटाई-कोई आवाज नहीं. थोड़े इंतजार के बाद उन्होंने आवाज दी, ‘आचार्या जी!’

बीच से किवाड़ खुले-जरा-सा. एक अधेड़ महिला ने सिर निकाला. फिर माथे पर आंचल खींचते हुए झटके से अंदर कर लिया. ‘दर्शन करने गए हैं.’

‘अचारिन, हिज वाइफ.’ कन्नी धीरे से बोले और हाथ जोड़ लिए.

कन्नी की देखा-देखी अंगरेजिन ने भी हाथ जोड़े, ‘नामास्ते!’

‘जाने कहां-कहां से फांस लाता है नई-नई रंडियों को लौंडा का नाती!’ पड़ाइन बुदबुदाईं, ‘चुपके से खिसको, नहीं मुहैं झौंस देंगे किसी दिन!’

अंगरेजिन कन्नी को ताकती रही-कौतूहल से.

‘थैंक यू वेरी मच. लेकिन बैठेंगे नहीं.’ कन्नी ने कहा और अंगरेजिन को अपने ढंग से समझाया. ‘मैडम वेलकम कर रही हैं. बैठने की जिद कर रही हैं लेकिन आचार्या जी नहीं हैं घर पर. वे महिषासुरमर्दिनी, बनकटे हनुमान और दुर्गाजी का दर्शन करने गए होंगे. वेरी हाईक्लास डिवोटी. जब तक दर्शन नहीं कर लेते, मुंह में अन्न नहीं डालते. पानी नहीं पीते! ही इज रीयल रिसी-मुनी. लाइक वशिष्ठा, लाइक विश्वामित्रा. चलिए, तब तक गंगाजी का दर्शन कर आएं.’

‘अंदर आइए!’ दोनों जैसे ही मुड़े, वैसे ही किवाड़ खुले और शास्त्री जी प्रगट भए.

 

मित्रो, कन्नी तन्नी के कोई नहीं! चेहरा ऐसा कि तन्नी की औलाद लगे लेकिन तन्नी के कोई नहीं कन्नी. ऐसे तो मुतफन्नी गुरु, पन्नी गुरु, अठन्नी गुरु-कइयों के चेहरे तन्नी जैसे हैं! यह माटी ही ऐसी है, इसके लिए तन्नी क्या करें? वे अपने लंगोट के जिम्मेवार हैं दूसरों के लहंगों के नहीं. कोई लहंगा उठाए जहां-तहां घूमता फिरे तो बिचारे तन्नी का क्या दोष?

बहरहाल, तन्नी गुरु का कहना कि गुरु, हमने तो वही किया अपनी पंड़ाइन के साथ जो एक मर्द एक औरत के साथ करता है लेकिन भोंसड़ी के पैदा हो गए तो हम क्या करें? मुहल्लों के ज्यादातर नौजवान इसी शैली में प्रगट हुए हैं, न उन्हें उनके मां-बाप ने पैदा किया है, न वे पैदा हुए हैं. जिन्होंने पैदा किया है या जो पैदा हुए हैं-वे अगर डाॅक्टर, इंजीनियर, अफसर नहीं, तो भी कुछ न कुछ हैं. और कुछ नहीं तो दुकान-दौरी करके मस्त हैं लेकिन जो ‘प्रगट भए’ हैं, वे ‘जनसेवा’ या ‘परोपकार’ के रास्ते ‘धर्म की जय हो! अधर्म का नाश हो! प्राणियों में सद्भावना हो! विश्व का कल्याण हो! हर-हर महादेव!’ कर रहे हैं.

चूतिये यानी पप्पू की दुकान में बैठने वाले आप्रवासी अस्सीवासी चूतिये इस ‘विश्व-कल्याण’ को धंधा बोलते हैं.

चले आ रहे हैं दुनिया के कोने-कोने से अंगरेज-अंगरेजिन! हालैंड से, फ्रांस से, हंगरी से, से,ऑस्ट्रिया स्विटजरलैंड से, स्वीडन से, ऑस्ट्रेलिया  से, कोरिया से, जापान से! सैकड़ों नहीं, हजारों की तादाद में-इस घाट से उस घाट तक. किसी को तबला सीखना है, किसी को सितार, किसी को पखावज सीखना है, किसी को गायन, किसी को कत्थक सीखना है, किसी को बांसुरी, किसी को हिंदी, किसी को संस्कृत-कुछ नहीं तो किसी को संगीत समारोहों में घूम-घूम सिर ही हिलाना है. और इस छोटे से शहर में घर-घर मंदिर-वास्तुकला- मूर्तिकला के हजारों नमूने. देखने-ताकने की सैंकड़ों जगहें. शहर में भी, शहर से बाहर भी. गंगा मईया और घाट जो हैं सो तो हैं ही. शुरू कीजिए तो एक जिंदगी छोटी लगे. मदद के लिए आगे न आइए तो लूट लें साले पंडे, गाइड, मल्लाह, रिक्शेवाले, होटल वाले-सभी. और इस मदद को चूतिये हैं कि धंधा बोलते हैं.

कन्नी गुरु, आपने मुलुक-मुलुक के अंगरेज-अंगरेजियन का नाम लिया, अमेरिका इंग्लैंड को छोड़ क्यों दिया?

‘नाम मत लीजिए भोंसड़ी वालों का! बड़े हरामी हैं साले! आते हैं, क्लाक्र्स, ताज, डी पेरिस में ठहरते हैं. गाड़ी में दो-चार दिन घूमते हैं और बाबतपुर(हवाई अड्डा) से ही लौट जाते हैं. दिल्ली से ही अपना फिट-फाट करके आते हैं भोंसडी के! वे क्या जानें बनारस को?’

घाट पर शास्त्री  जी का मकान-छोटा-सा. आगे-पीछे दो कमरे, बीच में छोटा-सा आंगन, आंगन में लैट्रिन और नल-बस. एक पतली-सी घुमावदार सीढ़ी है आंगन से ही जो छत पर पहुंचती है. छत पर खड़े हो जाइए तो अस्सी घाट, गंगा नदी और गंगा पार का पूरा मंजर दिखाई पड़ेगा लेकिन बाएं-दाएं के सारे दृश्य गायब. अगल-बगल दुमंजिले-तिमंजिले भवन हैं जो लाॅज बन चुके हैं. इनमें विदेशी ठहरते हैं. सामान्य दिनों में इनके हर कमरे का रेट पांच सौ रुपए एक दिन. सीजन में यही एक से डेढ़ हजार हो जाता है.

मुहल्ले का सीजन जनवरी से अप्रैल तक रहता है जब संगीत समारोह चलते हैं. इसके बाद दशहरे तक के लिए या तो वे स्वदेश लौट जाते हैं या काठमांडू.

मुहल्ले में ही कई मल्लाहों के घर हैं एक-दो कमरों के जिनमें नियमित रूप से कई विदेशी पेइंग गेस्ट हैं. उन्होंने एक कमरा किसी विदेशी को दे रखा है और दूसरे कमरे में पूरा परिवार रहता है-सभी औरत-मर्द-बच्चे. और वह विदेशी भले रहे तीन महीने, किराया साल भर का दे जाता है. बस, कमरा उसके नाम रहना चाहिए-जब चाहे तब आए और रहे. वह न सही, उसका दोस्त सही! किसी विदेशी को पेइंग गेस्ट रखने से मल्लाहों के जीवन स्तर में कितना फर्क आया है-इसे बाभनों-ठाकुरों की औरतें-बच्चे देखते रहते हैं. खाना-कपड़ा-लत्ता छोड़ भी दें तो देखते रहते हैं कि कानों में वाॅकमैन लगाए उनके बच्चे घूम रहे हैं, कैलकुलेटर लिए जोड़-घटा रहे हैं, औरतें दरवाजे के बाहर बैठी छोटा-सा ट्रांजिस्टर बजा रही हैं और उनकी मैक्सी पहने सूप में चावल बीन रही हैं.

 

कन्नी गुरु बैठे हैं शास्त्री जी की बैठक में चटाई पर. जींस की पैंट, सीने पर बोल्ड एंड ब्यूटीफुल छाप पीले-काले रंग की टी-शर्ट, कानों पर छाए हुए अमिताभ बच्चन स्टाइल बाल, बाएं कान में बाली, क्लीन शेव्ड इंटर फेल कन्नी गुरु!

चटाई पर ही उनके बगल में राजस्थानी घाघरे और चोली में अंगरेजिन. कंधे को ढंके हुए ‘जै श्रीराम’ छाप दुपट्टा. उम्र तीस-पैंतीस के इधर या उधर. घुटनों के पास गांधी आश्रम का झोला.

बैठक की दाईं तरफ छोटा-सा कोठरीनुमा शिवमंदिर. मंदिर के दरवाजे के पास संगमरमर का नंदी और सामने आधार में स्थित शिवलिंग जिसपर पड़ी हुई गेंदे की माला और बगल में खुंसी हुईं अगरबत्तियां. बाईं तरफ दरवाजे की ऊंचाई जितनी ऊंची आदमकद खिड़की. बैठे-बैठे छड़ों के बीच से गंगा और उस पर सरकती नावें दिखाई पड़ रही थीं. खड़ा हुआ जाए तो पूरा अस्सी घाट और घाटों की सीढ़ियां नजर आएंगी.

खिड़की से आती हुई गंगाघाट की हवा बड़ी खुशगवार, सोंधी और ताजी लग रही थी. ‘वंडरफुल!’ अंगरेजिन ने ठंडी और लंबी सांस ली.

चटाई के आगे चैकी पर लेवा(गुदड़ों और चिथड़ों से गूंथ-सिलकर बनाया गया बिस्तर) और लेवा पर पालथी मारे बैठे शास्त्राी जी. ज्योतिषाचार्य, वेदाचार्य, भिषगाचार्य, व्याकरणाचार्य, पामिस्ट शास्त्राी जी. मारवाड़ियों के एक संस्कृत पाठशाला में अध्यापक. उम्र पचास साल से ऊपर रही होगी. गले में नन्हें मोटे दानों वाली रुद्राक्ष की दो मालाएं, बाईं भुजा पर लाल रंग के डोरों से बंधा ताबीज. तोंद की गहरी नाभि के ऊपर चंदन का सफेद टीका, दूसरा टीका गले की रेखाओं के बीच और ललाट पर सफेद टीके के बीच लाल रंग की महबीरी.

शास्त्री जी थोड़ा अस्थिर और विचलित हो रहे थे. उनके नेत्रा आंगन में खुलने वाले दरवाजे की ओर लगे थे जहां बार-बार मना करने और डांटने के बावजूद उनके बच्चे-बच्चियां हंसते- खिलखिलाते-शरमाते झांक-झांक जाते थे और भगाने के बाद भी आकर खड़े हो जाते थे. जब उन्होंने पड़ाइन को भी बच्चे- बच्चियों के साथ खड़े और एकटक अपनी ओर ताकते देखा तो उनसे रहा नहीं गया. वे कन्नी गुरु से बोले, ‘मान्यवर, किवाड़ बंद कर देवें.’

कन्नी गुरु उठे और किवाड़ उठगाकर फिर आ बैठे.

शास्त्री  जी ध्यान में चले गए. उनकी आंखें बंद रहीं. थोड़ी देर बाद अपने आप ही बोले, ‘फ्राम फ्रांस!’

अंगरेजिन ने कन्नी को देखा. आश्चर्य से बुदबुदाई, ‘हाऊ ही नोज?’

कन्नी ने होठों पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया.

‘एम! फर्स्ट सिलेबिल आफ योर नेम?’

‘यस-यस मादलेन!’ अंगरेजिन खुशी में बोली.

‘मां डाइवोर्सी है. रहती उसके साथ हो लेकिन प्यार पिता को करती हो. पिता एक शाॅप में काम करते हैं. तुम्हारी रुचि भारतीय साहित्य और स्थापत्य में है. पेंटिंग में भी मन लगता है. पेरिस की भीड़-भाड़, दौड़-धूप, व्यस्तता से मन ऊब गया है. शांति की खोज में हो. अकेलापन पंसद है तुम्हें...’ शास्त्री जी बोलते रहे-उसी तरह आंखें बंद किए और वह फटी आंखों कन्नी को देखती रही.

‘यू सी, हाई क्लास ज्योतिषाचार्य!’ कन्नी बुदबुदाए.

मादलेन ने देखा, शास्त्री  जी अभी ट्रांस में ही हैं. वापस नहीं आए हैं. ये बातें अगर पता थीं तो सिर्फ कन्नी को और कन्नी उसके साथ पहली बार मिल रहे थे शास्त्री जी से. मादलेन उनसे बहुत कुछ जानना चाहती थी लेकिन मुश्किल यह थी कि न तो ठीक से हिंदी जानती थी, न अंग्रेजी. उसके पास दो शब्दकोश थे-इंगलिश-फ्रेंच और हिंदी-इंगलिश. जब हिंदी का कोई ऐसा शब्द सुनाई पड़ता जो उसकी समझ में न आता तो वह तत्काल उनमें ढूंढ़ने लगती-लेकिन वे नहीं मिलते.

‘तो किस प्रयोजन से कष्ट किया है आपने? क्या नाम बताया, काशीनाथ!’

कन्नी बोले, ‘संस्कृत पढ़ना चाहती हैं मादलेन.’

शास्त्री जी हंसे, ‘मादलेन संस्कृत पढ़ना चाहती हैं.’ वे हंसते रहे और तोंद पर हाथ फेरते रहे, ‘मादलेन, संस्कृत भाषा नहीं, देववाणी है, और तुम तो काशी में ही रहते हो काशीनाथ, समझाया नहीं इसे? देखो, यह धूर्तों, पाखंडियों और लोभियों का नगर है. इसी महाल में पचासों संस्कृत-शिक्षण केंद्र और संस्थान हैं. ‘संस्कृत इन थ्री मंथ्स’, ‘संस्कृत इन सिक्स मंथ्स’ टांग रखा है सबने. लेकिन न तो व्याकरण का ज्ञान है, न भाषा का, न साहित्य का. मुझे कुछ नहीं कहना चाहिए उनके बारे में क्योंकि सभी मेरे ही शिष्य हैं. मैंने ही पढ़ाया है उन्हें लेकिन मिथ्यावादन नहीं कर सकता मैं. बोर्ड तो मैंने भी लगा रखा है-संस्कृत इन सिक्स मंथ्स.’ लेकिन वास्तविकता क्या है? वास्तविकता यह है कि सारी जिंदगी बीत गई देववाणी पढ़ते-पढ़ाते और मुझे लगता है कि मैं ठीक से उसकी वर्णमाला भी नहीं जानता. लेकिन यह इतनी कठिन भी नहीं कि छह महीने में सीखी न जा सके! लेकिन यह भी है कि यह सबके वश की बात नहीं.’

मादलेन सिर हिलाती रही और समझने की कोशिश करती रही.

‘संप्रति कहां निवास है आपका?’

कन्नी बोले, ‘केदारघाट पर गैजेज लाॅज में.’

‘कितना किराया है कमरे का?’

‘तीन सौ रुपए पर डे!’

‘अरे? यह तो कुछ भी नहीं! इसी मुहल्ले में कई विदेशी रहते हैं. इन्हीं मल्लाहों और खटिकों के यहां रहने लायक कोठरी नहीं लेकिन पांच सौ रोज पर रहते हैं.’

‘हां शास्त्री  जी, रहते तो हैं लेकिन उन्हें चाय-नाश्ता, दो टाइम का खाना, सब मिलता है. उसी में कपड़ों की धुलाई-इस्त्री  सब शामिल है. निश्चिंतता कितनी है?’

‘तो क्या लाॅज में यह सब नहीं हैं?’

‘कैसी बात कर रहे हैं? लाॅज में कहां होता है यह सब? नाश्ता बाहर, खाना बाहर, कपड़ों की धुलाई बाहर, चाय बाहर. बहुत कष्ट है. हम तो महीने भर से खोज रहे हैं कोठरी. मादलेन तो किसी घर में पेइंग गेस्ट तक होने के लिए तैयार हैं. कहीं मिले तो?’

इसी समय शास्त्री  जी के विद्यालय से कोई ब्राह्मण-बटुक आया. चरण-रज लेकर जब खड़ा हुआ तब शास्त्राी जी ने अंदर से प्रसाद और चाय लाने का आदेश दिया.

प्रसाद और चाय आने तक शास्त्री जी गंभीर बने रहे.

‘मेरा रेट तो तुम्हें पता होगा काशीनाथ!’

‘जी हां. दो सौ रुपए प्रति घंटा.’

‘हां, साथ ही एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या को कोई कक्षा नहीं.’

‘शास्त्री जी!’ कन्नी ने मादलेन की ओर देखते हुए कहा, ‘शास्त्री जी, मादलेन केवल कक्षा के लिए नहीं आई हैं. क्यों?’

मादलेन ने ‘हां’ में सिर हिलाया.

शास्त्री जी गंभीर हो गए और देर तक चुप रहे, ‘मुझे संकट में मत डालो काशीनाथ.’

कन्नी ने अनुनय किया, ‘मुझे पराया न समझें शास्त्री जी. इस नगर का हूं तो आपके घर का ही हूं समझिए.’

शास्त्री  जी खड़े हो गए-‘यह मेरी पूजा का समय है, इस वक्त चलो. कल आना. नहीं, कल नहीं, परसों. कल तो शनिवार है. संकटमोचन का दिन.’

कन्नी और मादलेन ने चरण-स्पर्श किया और बाहर आए.

 

जैसे ही मादलेन के साथ कन्नी गली में गुम हुए वैसे ही बैठक में शास्त्री जी का पूरा परिवार जुट आया! तीन बच्चियां, दो बच्चे और पड़ाइन. शास्त्री जी पुलकित थे. वे चैकी पर बैठे थे और बच्चियां उनके पेट और पीठ पर कूद रही थीं. (यह दूसरी शादी थी, शास्त्राी जी की. काफी लेट. पहली से एक लड़की और बेटा था. दोनों की शादी हो गई थी. छह महीने हुए, बेटा अपनी पत्नी के साथ घर छोड़कर चला गया था.) 

‘बैठो सावित्री, ऐसा लगता है कि दिन फिरने वाले हैं.’

‘पड़ाइन चुप और चिंतित. अगर कोई अंग्रेज होता तो वे चिंतित न होतीं लेकिन अंगरेजिन? और अंगरेजिन भी वह जो कनिया(कन्नी) जैसे लफंगा और लुच्चा के साथ घूमे! उन्होंने किवाड़ की दरार से उसकी जवानी, आंखें और हंसी देखी थी. वे अपने पंडित की घटिहाई और छिनारपने से भी परिचित हो चुकी थीं. अगर उनकी आदतें ठीक-ठाक रही होतीं तो बेटा बहू के साथ घर से न गया होता. लोग तो यही समझते हैं कि सौतेली मां का व्यवहार ठीक नहीं था.

‘आज ही शाम को खाने पर आएगा कन्नी. जरा जम के खिलाओ उसे. पैसा मत देखो!’

‘बुलाया तो परसों है, आज क्यों आएगा?’

शास्त्री जी रहस्यपूर्ण ढंग से हंसे. ‘सारा कुछ तुम्हीं समझ लोगी? अरे, अभी बातें ही कहां हुई हैं? मैं ही था एक पढ़ाने वाला? जरा सोचो, वह कहीं और क्यों नहीं गया? दूसरों के यहां भी तो जा सकता था? और आज का मत देखो, कल की सोचो! एक बार शुरू हो गया तो बंद नहीं होने वाला. इसलिए नीति यही कहती है कि अगर वह हमारा ध्यान रखता है तो हमें भी उसका ध्यान रखना चाहिए.’

पंडित का उत्साह देखकर पड़ाइन परेशान हो रही थी और बेचैन भी.

‘जगुआ मल्लाह का देखो! खोबार थी उसकी कोठरी, घिन बरती थी उधर ताकते हुए. अब कितने साफ-सुथरे उसके कमरे हैं और कितने अच्छे बच्चे. मुहल्ले में हैं किसी बाभन के वैसे बच्चे? तरह-तरह की डिजाइन वाले पैंट-शर्ट पहनते हैं, कान में मशीन लगाए गाने सुनते हैं. पहले रात-दिन लड़ाई-झगड़े और चिल्लपों मचाए रहते थे और अब देखती हो, पढ़ते-लिखते भी दिखाई पड़ते हैं. और उनकी औरतें और बेटियां? इतनी गंदी कि कै आती थी और अब सामने से गुजरती हैं तो कैसी अगरबत्ती की सुगंध आती है!

‘छह महीने में तुम भी यह सब कर लेना. और भी जो चाहो, कर लेना. कौन देखता है? मुझे तो चूल्हा-चक्की से ही फुर्सत 

नहीं.’ पड़ाइन ने कुढ़कर कहा.

‘छह महीने?’ शास्त्री जी पड़ाइन की बुद्धि पर हंसे, बच्चियों को कमरे से खदेड़कर बाहर किया और बैठ गए, ‘देखो, पागल भई हो क्या? ध्यान से सुनो! क्या नाम है उसका? मादलेन! तो मादलेन लाॅज में नहीं रहना चाहती, पेइंग गेस्ट होना चाहती है. लाॅज का जितना किराया है, उतने में अगर रहना, खाना, नाश्ता, चाय, नहाना-धोना सब हो जाता हो तो क्या बुरा है?’

पड़ाइन कुछ सोच में पड़ गईं. संदेह से पंडित को देखती रहीं. थोड़ी देर बाद बोलीं, ‘तो किसके घर में रख रहे हो उसे?’

‘इसी घर में? अपने घर में? और कहां?’

इतना सुनना था कि पड़ाइन सचमुच पागल हो गईं. वे पंडित को घूरती रहीं. फिर तमतमाया चेहरा लिए खड़ी हो गईं. फुफकारती हुई. ‘अरे बेशरम! बेहया! थूककर चाटने वाले! कल तक मुहल्ले में घूम-घूमकर इन अंगरेज-अंगरेजिनों को म्लेच्छ और जानवर कह रहे थे, कह रहे थे कि साले नहाते-धोते नहीं, झाड़ा फिरते हैं तो कागज से पोंछकर फेंक देते हैं. गोमांस खाते हैं, राक्षस हैं. तुम्हीं ने बताया था इटली वाली अंगरेजिन के बारे में जो रीवां कोठी के बगल में रहती थी. कौन कहता था कि छिनाल को मर्द के बिना नींद नहीं आती? हर रात एक मर्द चाहिए उसे. खिड़की खोलकर देखती रहती थी और किसी न किसी लड़के को फांसकर ले जाती थी. कौन कहता था यह सब? कहते थे या नहीं कहते थे?’

‘और सुनो, नुक्कड़ वाले दुबे का तो बड़ा मकान था. वे जब एक अंगरेज को रखना चाहते थे तो क्यों आसमान सिर पर उठाया था तुमने? और वह दाढ़ीवाला अंगरेज! वह तो बाल-बच्चे वाला भी था. बीवी भी थी उसके साथ. उपाध्या जी ने जब उसे कोठरी उठानी चाही किराए पर, तो क्यों बलवा मचाया? तब मुहल्ले के लड़के-लड़कियां खराब हो रहे थे, धरम भ्रष्ट हो रहा था और अब?’

पड़ाइन पागलों की तरह चिल्ला रही थीं. इतने जोर-जोर से कि सभी बच्चे एक बार फिर दौड़कर बैठक में चले आए. वे कभी मम्मी को देखते, कभी पापा को.

पंडित धीर-गंभीर शांत भाव से चुपचाप सुनते रहे और पड़ाइन वह सब बोलती रहीं जो अब तक नहीं बोल सकी थीं. वे झनकती- पटकती-चीखती-चिल्लाती रहीं. पंडित सिर झुकाए सुनते रहे. अधिक से अधिक बीच-बीच में सिर उठाते और मुस्कुराकर पड़ाइन को देख लेते.

पड़ाइन अंत में थककर रोने लगीं, फिर उठीं और दूसरे कमरे में चली गईं. गिर पड़ीं चैकी पर धम्म से! उनकी हिचकियां बैठक तक सुनाई पड़ रही थीं.

लड़के पतंग और पटेला के साथ छत पर चले गए.

बच्चियां घर के बगल के पालिका पाठशाला में. वहां उनका मनमाना घर जाना था. जब उनका मन करता, स्कूल जातीं, जब मन करता लौट आतीं. स्कूल उनके मन पर था.

पत्नी की हिचकियों ने विगलित कर दिया था धर्मनाथ को. उन्होंने पद्मासन लगाया और आंखें बंद कर लीं! जैसे एक तूफान का झटका था जो चला गया. वे न हिले, न डुले-अचल स्थिर बैठे रहे. ऐसे मौके पर वे दूसरों को उपदेश देते. ‘भगवद्गीता’ का पाठ करो! या ‘रामायण’ का पारायण करो!

‘उत्तरकांड’ उन्हें कंठस्थ था लेकिन जिस प्रसंग को वे स्मरण करना चाहते थे, वह चित्त की चंचलता के कारण उपस्थित नहीं हो रहा था.

 

पड़ाइन जब खाने के लिए बुलाने आईं तो शास्त्री जी सो गए थे-बैठे-बैठे.

‘नहीं, भूख नहीं है.’ उन्होंने कहा.

जब पड़ाइन बिना कुछ बोले वापस होने लगीं तो शास्त्री जी थके स्वर में बोले. ‘सावित्री, यहां आओ. बैठो मेरे पास.’

पड़ाइन आईं और आज्ञाकारी पत्नी की तरह बैठ गईं.

शास्त्री जी और पड़ाइन की उम्र में पंद्रह-सोलह साल का फर्क रहा होगा. यह उनकी दूसरी औरत थीं-गोरी, पतली और सुंदर. अगर पंडित ने ताबड़तोड़ पांच बच्चे न पैदा किए होते तो आकर्षक भी रहतीं. उनकी आंखें सूजी थीं और माथे से आई बालों की एक लट नथुनों की हवा से बार-बार उधरा रही थी.

‘तुमने खाया?’

पड़ाइन ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘चलो, आज साथ खाते हैं.’ शास्त्री जी उठे और सावित्री के साथ चैके में आए.

चैके का मतलब आंगन में जहां छत के लिए सीढ़ियां जाती हैं, उसी के नीचे टिन से घेरकर बनाया गया किचेन.

एक थरिया भात, उसी में एक किनारे साग और एक कटोरा पनियल दाल-जस्ते के भगौने में सारा कुछ सानकर बैठे हैं शास्त्री जी, ‘एक बात पूछें? तुम्हें जलन तो नहीं हो रही है अंगरेजन से?’

पड़ाइन ने शास्त्री जी पर नजर डाली और हंस पड़ीं-व्यंग्य से ‘हो रही है, क्यों नहीं होगी? ऐसा मरद कहां मिलेगा किसी औरत को? देह भर भालू जैसे बाल, हंडा जैसा पेट, मेढक जैसी चाल. अब भी रह गए हो किसी औरत के काम के? अरे, अगर मेरे बाप अस्पताल में नहीं मर रहे होते तो तुम्हीं एक मरद नहीं थे मेरे भाग में!’

‘फिर क्यों परेशान हो रही हो तुम?’

‘परेशान अपने लिए नहीं, बच्चों के लिए हूं. घर जो भरभंड होगा सो तो होगा, बच्चों को कुछ हो गया उस चुड़ैल के आने से तो तुम्हें नहीं छोडूंगी, इतना बता देती हूं.’

‘कुछ नहीं होगा. किसी को कुछ नहीं होगा! मैं बिला नागा क्यों दर्शन करता हूं महिषासुरमर्दिनी का? सुनो, कभी बताया नहीं तुमसे. ‘देवी भागवत’ की कथा है. महिषासुर कितना भयानक, कितना अत्याचारी राक्षस था जानती हो. देवी-देवता-ऋषि-मुनि सब थरथर कांपते थे उसके डर से. तो दुर्गा जी ने जब उसकी छाती पर पैर रखा और मारने के लिए गंड़ासा ताना तो हाथ जोड़ दिए महिषासुर ने. ‘मां, एक विनती है मेरी. मारने से पहले एक वरदान दें कि मेरी जगह बराबर आपके चरणों में रहे.’ उसी समय मां ने कह दिया कि, ‘जाओ, अगले जनम में पंडा बनो! मुझसे पहले तेरी पूजा हो.’ नतीजा देख रही हो? किसी को भगवती या भगवान का दर्शन करना होता है तो हमारे पास आता है.क्या समझीं? जिस देवी ने हमें वरदान दिया है, वह हमारा अहित होने देंगी?’

पड़ाइन कुछ देर मुंह चलाती रहीं, फिर खाली भगौने को नल के नीचे ठेल दिया.

‘पता नहीं क्यों, अच्छा नहीं लग रहा है घर में क्रिस्तान का घुसना.’ पड़ाइन ने कुछ सोचते हुए पूछा, ‘वह केदार घाट क्यों छोड़ना चाहती है? वहां रहते हुए भी तो पढ़ने आ सकती है? है ही कितनी दूर?’

‘कुछ कारण हैं तभी तो. एक तो वह हिंदू परिवार में रहकर भारतीय परिवार को देखना-समझना चाहती है, दूसरे नगर में इस बीच जो दो-तीन घटनाएं हुई हैं, उसकी जानकारी उसे भी है. अरे, तुम्हें भी तो है उसकी. वही डायना वाली, नहीं है क्या?’

चैके में बैठे-बैठे शास्त्री  जी पूरी कहानी सुना गए. ‘डायना ऑस्ट्रेलिआई लड़की थी जो बनारस देखने आई थी. यहीं उसका परिचय हुआ एक प्राइवेट गाइड से. एक क्षुद्र, संस्कारहीन, घृणित यादव से. साला हरामी कहीं का! उसने डायना को बनारस और आसपास का सारा कुछ दिखाया और अपने व्यवहार से उसका विश्वास जीत लिया. एक दिन डायना ने इच्छा जाहिर क-कोई गांव देखने की. यादव गाजीपुर का था. वह अपने गांव ले गया. उसके लुच्चे-लफंगे दोस्त. गोरी चमड़ी देखी तो लार टपकाने लगे. सबने जबरदस्ती एक रात बलात्कार किया उसके साथ. डायना ने यादव से झगड़ा किया और उसे जेल भिजवाने की धमकी दी. नतीजा यह हुआ कि रात में ही उसने उसकी हत्या करके उसी कमरे में दफन कर दिया. रहस्य खुला तीन महीने बाद जब डायना का बाप आस्ट्रेलिया से अपनी बेटी को ढूंढ़ते हुए आया.दूसरी तो अभी हाल की घटना है जब दशाश्वमेघ के किसी लाॅज में एक जापानी लड़की की लाश मिली थी रस्सी से लटकती हुई. पुलिस आज तक छानबीन कर रही है कि वह हत्या थी या आत्महत्या! और गंगा पार पुल के नीचे अभी-अभी जो लाश पाई गई है-सड़ी- बजबजाती हुई, उसके बारे में तो तुम्हें मालूम ही है.’

‘डर लग रहा है यह सब सुनकर.’ हाथ धुलाते हुए पड़ाइन बोलीं.

‘तुम्हें तो मगन होना चाहिए. ऐसा न होता तो लाॅज छोड़कर कौन घर में रहना चाहता?’

 

देखो तो क्या थे पांडेय धर्मनाथ शास्त्री? घाट की कमाई खाने वाले पंडा. घाट पर छतरी के नीचे शीशा, कंघी, चंदन, रोली, लुटिया में गंगाजल लेकर बैठने वाले पांडे जी. पुरखों ने विरासत में उन्हें दो चीजें दी थीं-जजमानी में मिला दो कोठरी का मकान और घाट पर छतरी के नीचे पत्थर की चटिया. साथ में जीविकोपार्जन के लिए संकल्प कराने की विधि रटा गए थे-‘ऊँ विष्णोर्विषणो कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखंडे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गते काशीपुण्यक्षेत्रो केदारखंडे निकटे विराजते जाहन्वीतटे मासानाम् मासे अमुक वासरे अमुक तिथौ अमुक गोत्रौ अमुकनाम वर्माहम संकल्पं करिष्ए’ लेकिन घाट की आय कितनी, चवन्नी-अठन्नी जितनी-और वह भी अधिक से अधिक दस बजे तक जब तक स्नानार्थी आते हैं. उसके बाद?

उसके बाद की अवधि में पांड़े जी शास्त्री भये. अपने पौरुख से. और मारवाड़ी जजमान की कृपा से संस्कृत पाठशाला में अध्यापक. लेकिन अध्यापक की आय कितनी? जिये जाओ जितनी! इसलिए आचार्य होना पड़ेगा. नाना विषयों में नाना आचार्य. समाज के हर तबके के लिए. और यह कोई उपाधि नहीं, सम्मान है. यदि त्रिपुंड और त्रिशूल में दम है तो झख मारकर सम्मान करोगे. करोगे कैसे नहीं? नहीं करोगे तो रहोगे कहां? यह सब ठीक लेकिन आचार्य की आय कितनी? पायलागी जितनी!

शास्त्राी जी जैसे ही महिषासुरमर्दिनी का दर्शन करके आए और बैठे ही थे कि पड़ाइन रसोई के काम छोड़कर फिर हाजिर!

‘कुछ भी कहो, अंगरेज-अंगरेजिन को घर में रखना मुझे अच्छा नहीं लग रहा है.’

शास्त्राी जी ने पड़ाइन को गौर से देखा. उन्हें झुंझलाहट महसूस हुई.

‘ऐसा है कि बैठ जाओ. लगता है तुम्हारे घाट वाले संस्कार गए नहीं. जमाने के हिसाब से चलना सीखो!’

वह बैठ गईं, चुपचाप.

‘देखी है कभी जगुआ की मेहर की साड़ी? और अपनी देखो, अपने कान, नाक, गला और कलाई देखो. उसे पहले भी देखा है तुमने और अब देखो. तुम्हारा मन भले न करे लेकिन मैं अपने मन का क्या करूं? क्या मैं नहीं चाहता कि तुम लुगरी नहीं, साड़ी पहनो, गहने पहनो! बच्चियां कायदे से पढ़ें-लिखें, अच्छी शादी हो, अच्छा वर मिले, घर मिले, जाएं तो सास ताना न मारे. संस्कृत लिखने-पढ़ने का सुख तो भोग लिया तुमने. क्या चाहती हो, लड़के भी घाट पर बैठें? दिनभर पतंग उड़ाएं? गली में टिल्लो मारें? लड़कियां तो, मान लो, चली जाएंगी, कल बहुएं आएंगी, बच्चे होंगे. क्या इन्हीं दो कोठरियों में रहेंगी बहुएं पति और केंचा-केंची के साथ? हम-तुम कहां जाएंगे? और महंगाई का जो हाल है, देख रही हो उसे? बोलो, हां-ना कुछ तो बोलो!’

पड़ाइन ने पंडित को अपनी ओर देखते देखकर भी नहीं देखा.

‘एक बात बताएं?’ पड़ाइन को सहसा जैसे रास्ता मिल गया हो. ‘तुम अंगरेजिन को रख दो उपध्या या दूबे के घर में. उनके यहां जगह भी है, निकट भी है और चाहते भी रहे हैं वे. पढ़ने के लिए आ जाया करे यहां?’

‘चूतिया हूं मैं? हर महीने अपनी जेब से पंद्रह हजार रुपए उन्हें दिया करूं? फालतू में?’

‘पंद्रह हजार?’

‘हां पंद्रह हजार! जोड़ो जरा, एक दिन का किराया पांच सौ रुपए तो तीस दिन के कितने हुए? और यह मेरे हिस्से का किराया है! यहां रहेगी तो किसके होंगे?’

पड़ाइन आश्चर्य से शास्त्री जी को देख रही थीं.

‘दो सौ नहीं तो डेढ़ सौ प्रति घंटा के हिसाब से ट्यूशन के भी जोड़ लो! कितने हुए? साढ़े चार हजार. साढ़े चार में पांच सौ कन्नी के निकाल दो और उसमें किराए के पंद्रह हजार जोड़ दो. इस तरह हर माह उन्नीस हजार. न हर्रे, न फिटकरी-घर बैठे उन्नीस हजार. यह सपना नहीं, सच है. और तुम चाहती हो मैं सिर्फ चार हजार अपने पास रखूं और पंद्रह हजार दूबे या उपध्या को दे दूं! मुझसे बड़ा चूतिया और कोई होगा दुनिया में?’

शास्त्री बोले जा रहे थे और पड़ाइन सुने जा रही थीं-मुंह बाए. उन्होंने जिंदगी में इकट्ठे न इतने रुपए देखे थे, न सुने थे. कहां से मिलते हैं उन्हें इतने रुपए? कौन देता है? किसलिए देता है? क्या इसीलिए कि अपने गंजी और सुथना पहन के घूमो सब कुछ दिखाते और झलकाते हुए और मुफ्त में लुटा दो यह दौलत? सोचो तो, मुफ्त में कोई क्यों देगा?

पड़ाइन सिर पकड़े हुए असमंजस में पड़ी रहीं. थोड़ी देर बाद हंसकर बोलीं, ‘मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है कि यह अच्छा है कि खराब! हराम की कमाई जैसी लग रही है मुझे तो.’

‘हराम की?’ शास्त्री जी ने चिढ़कर कहा, ‘और जजमानी क्या है? घाट की कमाई क्या थी? ऐं? हां, एक बात और जान लो! कोई जरूरी नहीं कि वह छह महीने ही रहेगी! खुश हो गई हमारे तुम्हारे व्यवहार से, खातिरदारी से और जदि जगह पसंद आ गई तो साल-दो साल के लिए भी उठा सकती है कोठरी-बोल रहा था कन्नी. जाएगी, फिर आएगी. भले दस-बीस दिन ही ठहरा करे. आना-जाना लगाए रखेगी, कमरा उसी के नाम रहेगा और बंद रहेगा. इसलिए कि कौन जाने, खाली करके चली जाए तो कमरा किसी दूसरे को उठा दें हम! क्या करता है जगुआ? यही तो करता है!’

‘लेकिन कोठरी है कहां? दो ही कोठरियां हैं! रहेगी कहां?’, पड़ाइन ने पूछा.

‘छत पर.’

‘छत पर? क्या बैठक और आंगन से होकर आएगी-जाएगी? और छत पर है क्या, जहां रहेगी?’

‘चिंता मत करो, मैंने बात कर ली है कन्नी से. तीन महीने का एडवांस लेंगे और महीने भर में कोठरी तैयार करवा लेंगे’.

‘अरे, कमरा तो तैयार करवा लोगे लेकिन उसके आने-जाने का क्या करोगे? यह तो सोचो.’

शास्त्राी जी खीझ उठे, ‘तुम तो बड़ी अझेल औरत हो भई! न चैन से रहोगी, न रहने दोगी!’

इतना सुनना काफी था पड़ाइन को मुंह फुलाने के लिए. वे जाने के लिए खड़ी हो गईं.

‘जै श्रीराम चाचा!’ इसी वक्त कन्नी गुरु ने बैठक में प्रवेश किया.

 

कन्नी गुरु खुश थे. जींस की पैंट, टी-शर्ट और गले में लिपटा सीताराम छाप पीला अंगोछा. मैदान फतह करके आए थे कन्नी, ‘अब जाइए सवा किलो लड्डू चढ़ाइए संकटमोचन को. महीने भर से लगा हुआ था. आज जाके ‘हां’ कहा उसने. कल सुबह ईंटा-सीमेंट-बालू गिरवा दीजिए और काम शुरू करवा दीजिए कोठरी का. कल ही शाम को शायद एडवांस भी दे दे. लेकिन हां, भूले तो नहीं हैं ना मुझे?’

‘अरे, कैसी बात कर रहा है कन्नी? भला भूलेंगे कभी?’

‘इसलिए कहना पड़ रहा है कि उपध्या और दूबे ने कहीं बहुत ज्यादा मेरे को कमीशन का लोभ दिया था लेकिन मैंने कहा नहीं, मर्द की जबान एक. उसी की रोटी खाते हैं हम जिसे एक बार ‘हां’ कर दी, कर दी. फिर कोई धोखा नहीं.’

यह जानते हुए कि कन्नी धूर्त है और सरासर झूठ बोल रहा है, शास्त्री जी कृतज्ञ भाव से बोले, ‘मुझे सब पता है बेटा, नहीं भूलूंगा इस अहसान को. लेकिन एक बात है, उससे कहना बहुत जल्दी न मचाएगी. कोशिश यही करूंगा कि महीने भर में तैयार हो जाए.’

‘महीना भर कहां लगेगा चाचा! मुश्किल से हफ्ते-दस दिन का काम है.’

‘कैसे? इतनी जल्दी कैसे होगा?’

‘बताएं आपसे, कैसे होगा? देखिए, इस कोठरी का कुछ करना नहीं है. बनी-बनाई है. अब इसे लैट्रिन-बाथरूम से अटैच कर देना है, बस. और इसमें भी कोई समस्या मुझे नहीं नजर आ रही है. यह जो बगल वाली छोटी कोठरी है, उसी में नल लगवा दीजिए, फुहारा लगवा दीजिए, अंगरेजी स्टाइल वाला गमला बिठा दीजिए फर्श पर संगमरमर है ही, तौलिया-औलिया टांगने के लिए टाॅवल राॅड एक छोटा-सा. और सीवर लाइन गई ही है बाहर गली से, उससे कनेक्ट करवा दीजिए, बस. कै दिन लगेंगे इसमें?’

‘सुनो तो!’ शास्त्री जी ने कन्नी को समझाते हुए स्थिर भाव से कहा, ‘तुम तो अपनी ही बके जा रहे हो, सुन नहीं रहे हो मेरी. मैंने ठीक से पंचांग देख लिया है. दिशा-मुहूर्त सब समझ लिया है. छत पर जो कोठरी बनेगी, उसका मुंह पूरब की ओर होगा-गंगा की ओर. खिड़कियां होंगी तीन तरफ इसलिए कमरा हवादार रहेगा. खड़े हो जाओ तो गंगा, रामनगर, राजघाट का पुल, अस्सीघाट, रीवांघाट, तुलसीघाट, नगबा-सब दिखाई देगा. ‘सुबहे बनारस’ भी रोज दिखाई पड़ेगी. न होगा तो कोठरी के बाहर कुर्सियां रखवा देंगे दो-तीन बेंत की. सुबह-शाम बैठो, मजा ल्यौ! समझा?

कन्नी गुरु चुप. कुछ भी न कहा. न अहो, न अहा. उन्हें देखकर शास्त्री जी का उत्साह ठंडा पड़ गया. वे कन्नी को देख रहे थे और कन्नी गुरु उन्हें नहीं, पड़ाइन को देख रहे थे. वे थोड़ी देर उसी तरह बैठे रहे, फिर बोले, ‘चाची, क्या आप पसंद करेंगी कि मादलेन या कोई अंगरेजिन घर का अंदर-बाहर सब देखते हुए बराबर आए-जाए? आंगन में कोई नहा रहा है, कोई टट्टी कर रहा है, कोई नंगा लेटा हुआ है, उसी के बीच से आती-जाती रहे?’

यह कन्नी नहीं, जैसे वे खुद बोल रही थीं शास्त्री जी से, बल्कि बोल चुकी थीं शास्त्री जी से लेकिन इस वक्त सुन रही थीं कन्नी को.

‘यही बताइए आप, मान लीजिए वह ध्रुपद मेला में जाती है, संकटमोचन संगीत समारोह में जाती है, काजली-विरहा दंगल में जाती है. कभी रात के एक बजे, कभी दो बजे, कभी तीन बजे लौटती है. भई, उसे तो बनारस जानना है, देखनी है इंडियन कल्चर, समझनी है यहां की जिंदगी, तो आती है रात में किसी भी समय, तो क्या करेंगी? जागी रहेंगी रात भर उसके लिए? कि आए तो दरवाजा खोलें? यह करेंगी आप?’

पड़ाइन सुन रही थीं और शास्त्री जी का परेशान और उजड़ा हुआ चेहरा देख रही थीं.

‘इतना ही नहीं, मान लीजिए. वह कहें कि हम ऊपर ही चाय पिएंगे, नाश्ता करेंगे, खाना खाएंगे. कितनी बार ऊपर नीचे करेंगी आप?’

‘हम कर लेंगे. यह सारा कुछ कर लेंगे हम, यह मेरी जिम्मेदारी’.

शास्त्री जी ने अविश्वास से पड़ाइन को देखा-आंखों में चमक और खुशी के साथ.

पीछे आंगन से लेकर छत तक धमाचैकड़ी मचाए थे बच्चे. आपस में लड़ाई-झगड़ा कर रहे थे, उछल-कूद रहे थे-कौन रो रहा है, किसने किसको मारा कौन किसे नहीं पढ़ने दे रहा है-इस ओर किसी का ध्यान नहीं था. बीच-बीच में उनमें से कोई भागा-भागा आता, शिकायत करता और डांट खाकर रोते हुए लौट जाता. सबसे बड़ी लड़की थी गार्गी चैदह साल की और उससे वे संभाले नहीं संभल रहे थे.

‘शास्त्री चाचा!’ चुप-चुप काफी देर बाद बोले कन्नी गुरु ‘मैं कहना नहीं चाहता था अपनी जबान से लेकिन अब सुनिए आप. देख रहे हैं यह गंगा की ओर खुलने वाली खिड़की? दरवाजे के बराबर ऊंची और चैड़ी? आपकी बाईं तरफ वाली? मादलेन पांच सौ रुपए रोजाना इसी खिड़की के दे रही है, इस कोठरी के नहीं और न ही आपके केंचा-केंची और उनके चिल्लपों के और न ही दाल-रोटी के. मैं ही जानता हूं कि किस तरह समझा-बुझा के उसे राजी किया. बस इतनी ही उसकी इच्छा है कि कमरे के साथ ही अटैच्ड लैट्रिन-बाथरूम हो. आपको क्या परेशानी हो रही है उस कोठरी को टायलेट बनवाने में?’

‘अरे, कैसी बात कर रहा है कन्नी? वह कोठरी नहीं, महादेव जी का घर है! हम पूजा करते हैं रोज. गली से गुजरने वाले भी जल चढ़ाते हैं, फूल-माला चढ़ाते हैं. कैसा बोल रहा है तू?’

‘हूं.’ कन्नी सोच में डूब गए. वे भंग चढ़ाकर आए थे और तरंग में थे लेकिन शास्त्री  जी नशे की रेड मार रहे थे अपनी जिद से. उन्होंने जेब से विदेशी सिगरेट निकाली और लाइटर से जलाया, ‘चाचा! आप भी ब्राह्मण, मैं भी ब्राह्मण. मेरा गोत्रा आपसे ऊंचा ही है-शांडिल्य गोत्र. आप विद्वान हैं. वेद-शास्त्रा सब पढ़ रखा है आपने. लेकिन स्वामी करपात्री  जी जितने विद्वान तो नहीं ही हैं आप. जब बाबा विश्वनाथ के मंदिर में चमार घुस गए और उन्होंने छू दिया बाबा को तो क्या कहा था स्वामी जी ने? कहा था कि अब वे अपवित्र हो गए, अब उनका दर्शन ठीक नहीं, हम दूसरा मंदिर बनाएंगे. हम दूसरे महादेव की प्राण-प्रतिष्ठा करेंगे और किया उन्होंने! किया कि नहीं?’

कन्नी गुरु सिगरेट का एक लंबा कश लेने के बाद थोड़ा रुके और शास्त्री जी के भाव को पढ़ते रहे, ‘और महादेव जी कोई रामलला तो हैं नहीं कि वे जहां थे वहीं रहेंगे. वहां से टस से मस न होंगे! वे घुमंतू देवता हैं. उनके पास नंदी है, आज यहां हैं, कल कहीं और चल देंगे. कभी कैलाश पर, कभी काशी में. अपने मन के राजा! आज कमरे में हैं, कल छत पर जा बैठें तो? आप क्या कर लेंगे उनका? गलत हो तो कहिए!’

शास्त्री जी ने कुछ कहना चाहा लेकिन कहते-कहते रुक गए. फिर चिंतित स्वर में बोले, ‘लेकिन यहां कौन चमार है जो छूकर उन्हें अपवित्रा कर गया है?’

‘अरे! हद कर रहे हैं आप तो. ईसाइयों को क्या समझते हैं? वे तो चमारों से भी बढ़कर चमार हैं. महादेव जी को ही बर्दाश्त नहीं होगा कि कोई ईसाई उनके बगल में रहे. वे खुद ही भाग खड़े होंगे वहां से! खैर. मेरा धरम था भतीजा होने के नाते कि आपसे आपके भले की बात करूं. अब आप जानें, आपका काम जाने. सोचिएगा, मैं कल आऊंगा मादलेन के साथ. शाम को तीन महीने के एडवांस के साथ.’

कन्नी गुरु जब चले गए तब शास्त्री जी को ध्यान आया कि उन्होंने उसे खाने पर बुलाया था. पड़ाइन को भी कुछ कहने की सुध नहीं रही. उसके जाते ही वे आंगन में भागीं और बच्चों-बच्चियों की जी भर कुटम्मश करती रहीं. ऐसे अवसर पर प्रायः शास्त्री जी डांटते-डपटते थे, मना करते थे मारने-पीटने से, लेकिन वे चुप रहे.

दोनों ने एक-दूसरे से कोई बात नहीं की, खाया-पीया भी नहीं. खाना ही नहीं पका तो खाते-पीते क्या? लेकिन सोए एक ही कोठरी में! बीच में बच्चे, इधर पड़ाइन, उधर शास्त्राी जी. कुछ ऐसे जैसे बैठक किसी और के लिए हो.

 

रात भर दोनों सोए लेकिन जगे-जगे. रात भर उन्होंने सपने देखे और जगे-जगे.

सपने दोनों के अपने-अपने थे. शास्त्री के अपने, पड़ाइन के अपने.

पड़ाइन सपने देख रही थीं-तबीयत ढीली है, देह टूट रही है, उठने का जी नहीं कर रहा है. जी कर भी रहा है तो हिम्मत नहीं पड़ रही है लेकिन उठती हैं. उठना है इसलिए उठती हैं. आंगन का एक कोना-टिन का शेड है जिस पर किचेन है. चाय बनाती हैं-मादलेन के लिए नीबू की, शास्त्री जी के लिए दूध की. तब तक बच्चे उठ जाते हैं. जब तक उन्हें नहला-धुलाकर, बासी रोटियां खिलाकर पाठशाला भगाती हैं तब तक, ‘अरे सावित्री, पानी तो गरम करो मादलेन के लिए. मादलेन नहा रही है, फटाफट झाड़ू-पोंछा कर लो तब तक. नहाकर बाहर आ गई तो गीले कपड़े छत पर डाल दो, धूप में.’ ‘अरे, नाश्ते में क्या देर है सावित्री?’ कल सारनाथ गई थी, आज रामनगर जाना है राजा का म्यूजियम देखने! लंच थोड़ा पहले लेगी मादलेन! हें-हें-हें, लंच में क्या लोगी, मैडम?’ ‘रोज-रोज वही रोटी, वही सब्जी, वही दाल, वही भात! नहीं यार सावित्री, कभी चेंज भी होना चाहिए. कुछ स्पेशल. क्यों न हरी मटर की भरूई पूड़ियां बनें? पूड़ियां और गोभी की सब्जी, चटनी’.‘और मादलेन! तुमने ईख के कच्चे रस की खीर खाई है कभी? मिलती है तुम्हारे देश में?’

म्यूजियम से लौटी तो चाय. ट्यूशन से उठी तो चाय. इस दौरान बच्चों की उछल-कूद, मार-पीट, पें-पां. उनकी पढ़ाई-लिखाई गई जहन्नुम में. कोई जरूरी नहीं कि सब एक साथ टनमन रहें. किसी की नाक बह रही है तो किसी का पेट चल रहा है. यह सब भी देखो और डिनर भी तैयार करो. शास्त्री जी क्या कहते थे? जैसे सात, वैसे आठ. कुछ नया थोड़े करना है, समझ लो एक आदमी और बढ़ गया. लेकिन डिनर! पहले शास्त्राी जी भी जो दे दो वही खा लेते थे लेकिन अब डिनर कर रहे हैं. तो मादलेन! ‘गुडनाइट’ के लिए संस्कृत में कहेंगे-शुभ रात्रि, तो शुभरात्रि! सावित्री, जरा बिस्तर-उस्तर ठीक कर देना! चादर गंदी हो गई हो तो बदल देना. और देखो, तांबे के लोटे में पानी रखना न भूलना.

11×7 फीट की कोठरी और उसमें सात जनें. एक सिरे पर शास्त्री जी, दूसरे सिरे पर पड़ाइन, इनके बीच एक-दूसरे पर नींद में लात-मुक्का चलाते, रोते-सोते बच्चे-बच्चियां. और उस कोठरी में इन सबके ऊपर मच्छरों के साथ-साथ उन्नीस हजार पांच सौ रुपए रातभर उड़ रहे हैं. नाच रहे हैं, खनक रहे हैं.

इसी नृत्य-संगीत समारोह के सपने में आती है रमदेइया-जग्गू मल्लाह की औरत जो जब कभी गली से गुजरती थी तो आंचल से हाथ ढंककर तीन बार पड़ाइन के पांव छूती थी. आती है रमदेइया और गली से ही चिल्लाती है, ‘का सवितरा बहिन! झाडू-पोंछा कर लिया? पानी सबेरे से ही नहीं है नल में, कपड़े-लत्ते धोना हो तो ले ल्यौ. चलो घाट पर. सबुना भी लेंगे और नहा भी लेंगे. नीचे खड़े हैं, आ जाओ!’

 

शास्त्री जी के सपने दूसरे थे. उनके सपने में जग्गू और रमदेइया नहीं, शिवजी आ रहे हैं-बैल पर सवार, एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में डमरू, गले में लिपटा हुआ सांप. आगे-पीछे नाचते हुए भूत-प्रेत. सीधे कैलाश पर्वत से चले आ रहे हैं डमरू बजाते हुए. उन्हें देखते ही रामनगर से राजघाट के बीच पसरी गंगा लहराकर खड़ी होती है और रिबन की तरह उनकी जटा को लपेट लेती है. औघड़, अड़भंगी, अलमस्त, भंगेड़ी, गंजेड़ी बाबा. हर-हर महादेव! वे बैठक के मंदिर से निकलते हैं और आंगन में अपनी बारात रोककर नंदी की पीठ से उतर जाते हैं. उनकी आंखें क्रोध से लाल हैं, चेहरा तमतमाया है और माथे का चांद सूर्य की तरह दहक रहा है. जैसे वे नहीं बोल रहे हों, बिजली कड़क रही होµ‘बे धरमनाथ! कहां है बे? गधे, सुअर, उल्लू के पट्ठे धरम! निकल बे कोठरी से!’

धरमनाथ उस ठंड में भी पसीने-पसीने. वे कांप रहे थे और उठने की कोशिश ही कर रहे थे कि पेट पर शिवजी की लात और त्रिशूल की नोक छाती पर. त्रिशूल धंसा जा रहा है पसलियों के बीच. ‘‘चूतिये, मैंने बहुत बर्दाश्त किया रे! जहां मुझे रखा है, वह मंदिर है कि माचिस? हिमालय की ऊंचाइयों का पखेरू मैं, समुद्र की गहराइयों का थहैया मैं, अंतरिक्ष के सन्नाटे का ता-ता थैया मैं! तेरी मजाल कैसे हुई मुझे डिब्बा-डिब्बी में बंद करने की? अब तक मैं धतूरे और भांग के नशे में धुत था. मेरा दम घुट रहा है उस काल कोठरी में. अगर अपनी खैर चाहता है तो अभी इसी क्षण मुझे वहां से उस झोंपड़ी से निकाल और ले चल खुले में खुले आसमान में जहां चांद है, तारे हैं, नक्षत्र-मंडल है, सूर्य है, हवा है, धूप है, बारिश है. उठ और ले चल!’’

शास्त्री जी पसीने-पसीने. कांप रहे हैं और हाथ जोड़कर कुछ विनती करना चाहते हैं लेकिन बकार नहीं फूट रही है. ‘हे प्रभु! मैं अधम, कुटिल, खल, कामी. हिम्मत नहीं पड़ रही है मेरी. लोग क्या कहेंगे? कहेंगे कि लोभ ने इसकी मति भ्रष्ट कर दी है.’

‘हा-हा-हा-हा! मूर्ख! जिन लोगों की बात कर रहा है तू, वे हमारी ही सृष्टि है. वे भी और यह पृथ्वी भी. चाहूं तो अभी-अभी इसी क्षण लोगों को राख बना दूं और मुहल्ले को श्मशान. मेरी सुनेगा कि लोगों की? देख रहा है माथे की यह आंख?’

आर्तनाद कर उठे शास्त्री जी. घिघियाते हुए बोले, ‘प्रभु, डर इसलिए लग रहा है कि वह महिला एक अंगरेजिन है.’

रे मतिमंद! तूने वेद पढ़ा है. पुराण पढ़ा है. शास्त्र पढ़ा है. सब पढ़ा है फिर भी मूर्ख का मूर्ख ही रह गया. मैंने प्राणियों की सृष्टि की है, हिंदुओं, ईसाइयों, मुसलमानों की नहीं. ये तूने बनाए होंगे. जा, समझा मुहल्ले को. अब उठ और ले चल!’

आपका आदेश मेरे सिर माथे!’ शास्त्री जी ने माथा टेक दिया. ‘लेकिन प्रभु! मुझे समय दें दो-चार दिन का.’

‘एवमस्तु!’ शिवजी ने कहा और अंतर्ध्यान हो गए.

शिवजी अंतर्ध्यान हो गए लेकिन सपना चलता रहा. सपने में ही शास्त्री जी के घर के आगे बालू गिरा, फिर ईंटें गिरीं, फिर सीमेंट और काम शुरू हो गया कोठरी और टाॅयलेट का. सपने में ही शास्त्री जी ने जब उपाध्याय, दुबे, तिवारी, मिश्रा जी और मुहल्ले के दूसरे लोगों को शिवजी की बात बताई तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा. क्योंकि शिवजी शास्त्री जी के सपने में तो एक बार आए थे, लेकिन उनके सपनों में तो जाने कब से कई-कई बार आ रहे थे. शास्त्राी जी ही थे जिनके डर से वे किसी से चर्चा नहीं करते थे.

सहसा आधी रात के बाद शास्त्री जी की नींद टूटी और भूख महसूस हुई.

‘सावित्री!’ उन्होंने धीरे से आवाज दी ताकि बच्चियों की नींद न टूटे.

पड़ाइन कैसे बोलती? वहां रहती तब ना? वह तो अंगरेजिन के पैंट, शर्ट, राजस्थानी घाघरे-चोली और रिन की टिकिया के साथ घाट पर थीं.

लेकिन शास्त्री जी ने उन्हें कोठरी में ही देखा-मादलेन की मैक्सी में और खुश हुए.

(‘हंस’, जनवरी 2001)

 

 

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kashinath singh , hindi magazine , काशीनाथ सिंंह

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